किसान क्रेडिट कार्ड किसानों के लिए बना अभिशाप – कर्ज अदाएगी के बाद भी किसान हुआ डिफाल्टर

किसान क्रेडिट कार्ड किसानों के लिए बना अभिशाप – कर्ज अदाएगी के बाद भी किसान हुआ डिफाल्टर
विगत 06 माह से जिलें मेे किसानो के करीब 30 करोड़ रूपये का नहीं है हिसाब
परसवाड़ा – किसान कल्याण और सेवा का राग अलापते हुए कोई सरकार नहीं थकती, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, परन्तू किसानों की जो बदत्तर हालत है वह किसी से छुपी नहीं है, बालाघाट जिले के परसवाड़ा विकासखण्ड़ के किसानों की हालत तो अत्यन्त ही दयनीय है, जहां कर्ज माफी के झुठे चक्कर में पड़़कर कई किसान डिफाल्टर हो गये तो कई किसानो को आज किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ मिलना तो दूर, पूर्व में उठाए गए केडिट लोन की वजह से मूलधन चुकाने के बाद भी ब्याज भर कर सरकार की झोली भरना पड़ रहा हैै।
किसानों द्वारा केडिट कार्ड के माध्यम से प्रत्येक वर्ष सहकारी समितियों के माध्यम से नकद एवं वस्तू अर्थात खाद का उठाव किया जाता है, जिसको निर्धारित समय सीमा में सहकारी समिति में वापस जमा कर शुन्य प्रतिशत ब्याजदर में मिलने वाली सहूलियतों का फायदा उठाकर किसान अपना खेती कार्य कर जीवन यापन करता है, परन्तू विगत दो वर्षो से परसवाड़ा क्षेत्र का लगभग हरेक किसान अब इसी किसान क्रेडिट कार्ड योजना की वजह से कंगाल और कर्जदार बनता जा रहा है, जहां विगत वर्षो में खरीदी गई धान की अंतर की राशि 350 रूपये प्रतिक्विंटल एक वर्ष बाद भी अभी तक किसानों को नहीं मिली, वहीं चालू सत्र 2018 -2019 , और 2019 – 2020 के दौरान केसीसी के माध्यम से किसानों को प्रदाय लोन की राशि कथिततौर पर किसानों के कर्ज खाते में नहीं आने से किसान आर्थिक और मानसिक रूप से अत्यधिक परेशान और प्रताडि़त है, क्योकि सहकारी समितियों के रिकार्ड के अनुसार क्षेत्र के दौ सैकड़ा से भी अधिक किसानों ने अभी तक कर्ज की राशि का भुगतान समिति को नहीं किया है, जबकि किसानों से समिति के माध्यम से धान उपार्जन के दौरान किसानों के कर्ज की राशि की पहले ही अदाएगी कर शेष राशि का भुगतान किसानों के बचत खाते में कर दिया गया है, जिसका प्रमाण उपार्जित धान के तौल पत्रक से स्पष्ट होता है।
किसान क्रेडिट कार्ड ने किसानों को बनाया कर्जदार – सरकार द्वारा किसानों का जीवन स्तर उपर उठाने और उन्हें साहूकारों के कर्ज के चुंगल से बचाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना प्रारम्भ की गई थी , परन्तू यही किसान क्रडिट कार्ड अब किसानों के लिए गले की फांस बन गया है , विगत वर्षानुसार किसानों द्वारा योजनान्तर्गत समितियों से कर्ज उठाया गया, और कर्ज अदाएगी की निर्धारित अवधि के अंदर ही उसे बिक्रित धान से भुगतान कर जमा भी कर दिया गया, इस प्रकार किसान समिति के कर्ज से मुक्त हो गया, सोचकर वापस नये सत्र 2020 के लिए जब लोन और खाद के लिए समिति गया तो उसे बताया गया कि उसके पिछले कर्ज की राशि का भुगतान नहीं किया गया है, इसी वजह से किसान अब डिफाल्टर हो गया है, जिसे केसीसी का लाभ नहीं दिया जा सकता, जब किसानों द्वारा उपार्जित धान का तौल पत्रक दिखाकर बताया गया कि आपके समिति के माध्यम से ही पूर्व में किसान द्वारा बेची गयी धान से कर्ज की वसूली हो चुकी है, एैसे मेें कोई कर्ज किसान के उपर शेष नहीं बचता, तो फिर किसान डिफाल्टर कैसे को गया।
सहकारी समिति के अधिकारीयों द्वारा किसानों को बताया गया कि आपके लोन की राशि हमारे द्वारा धान उर्पाजन से काट लिया गया है यह सत्य है, परन्तू अभी तक उक्त लोन की राशि किसानों के लोन खाते में नहीं पहुंचने के कारण सहकारी बैंक द्वारा किसानों को कर्ज मुक्त नहीं किया गया है, जिसके चलते किसानों को केसीसी का लाभ हम नहीं दे सकते । इस प्रकार देखा जाए तो किसानों द्वारा लगभग 6 माह पूर्व ही अपने कर्ज की राशि का भुगतान समिति को कर चुका है, बावजूद इसके आज भी किसान न सिर्फ समिति का कर्जदार है बल्कि अब ब्याज का भी देनदार बन गया है, सबसे बड़ी परेशानी तो उन किसानों के सामने आकर खड़ी हो गई है जिनका लोन कालातीत हो गया था, तथा बुमुश्किल डिफाल्टर से सक्रिय किसान बनने के लिए उन्होने धान उपार्जन के दौरान समिति को धान बेचकर अपना कर्जा चुकता किया था, परन्तू उनकी राशि उनके लोन खाते में नहीं आने के कारण आज भी वे न सिर्फ डिफाल्टर बने हुए है बल्कि उनके उपर 14 प्रतिशत की दर से ब्याज भी ठोका जा रहा है।
साहूकारों के चंगुल में फंसा किसान – चुंकि वर्तमान समय में धान की रोपाई का कार्य चालू है, और मानसून सक्रिय है, यदि किसान द्वारा इस समय रोपाई का कार्य नहीं करेगा तो स्वाभाविक है कि खेती कार्य में वह पिछड़ जाएगा, और उसे फसल का उत्पादन नहीं मिलेगा, केसीसी का लाभ न मिलने की वजह से किसान की आर्थिक स्थिती डगमगा गई और उसे ना चाहते हुए भी साहूकारों के चंगुल में फंसना पड़ा, जहां उसे उचे दामों में बीज मिला और ज्यादा ब्याजदर के साथ कर्ज। वहीं कुछेक किसानों द्वारा अपने जेवरात बेचकर रोपाई कार्य का पूर्ण करना पड़ रहा है, इस समय यहां किसानों की हालत बहूत ही दयनीय और चिन्ताजनक बनी हुई है।
प्राप्त जानकारी अनुसार परसवाड़ा क्षेत्र अन्तर्गत आने वाली समितियां परसवाड़ा, बघोली और बोदा के कुल 347 किसान एैसे है जिनके करीब 01 करोड़ 82 लाख रूपये की लोन की राशि नहीं आने के कारण आज आर्थिक कंगाली के दौर से गुजर रहे है, और लगभग समस्त किसानों ने या तो अपने घर के जेवरात बेचकर धान की रोपाई की है, या फिर साहूकारों के कर्ज के तले दबकर किसी तरह अपना खेती कार्य कर रहा है। कोरोनाकाल की वजह से जहां पूर्व से ही लोगों के आर्थिक हालात बिगड़े हुए है, वहीं सोसायटी की इस मार से किसान मानों अब टूट सा गया है।
गोलमाल है कहां – बहरहाल कर्ज के तले दबकर ही सही किसान अपना कार्य किसी तरह कर तो रहा है लेकिन सवाल पैदा होता है कि आखिर गोलमाल है कहां, जिसकी वजह से बेवजह ही किसान के सामने आज बड़ी आर्थिक समस्या खड़ी हो गई है। इस विषय में कुछेक किसानों द्वारा सम्बन्धित अधिकारीयों से आवेदन और निवेदन कर समस्या के निदान की मांग रखी परन्तू किसी भी अधिकारी द्वारा मामले का समाधान करने के बजाय एक दूसरे पर दोषारोपण किया गया, जानकारी अनुसार यह विषम स्थिती सिर्फ परसवाड़ा विकासखण्ड़ की नहीं अपितू पूरे बालाघाट जिले की है, जहां के हजारों किसानों के करीब 30 करोड़ रूपये की बड़ी राशि का पिछले करीब 6 माह से कोई अता पता नहीं है, जब धान का विक्रय हो गया, तो उक्त करोड़ों की राशि आखिर गई कहां, करोड़ो की बात हो , और उसका कोई हिसाब किताब नहीं , इससे समझ आता है मामला बहूत बड़े घोटाले का है, यदि यह करोड़ों की राशि को कोई ब्याज में खेल रहा हो तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हरेक छोटे मोटे मामले को तूल देकर अपने राजनीतिक रोटी सेकने वाले नेताओं की चुप्पी भी इस मामले में संदेहास्पद है । वहीं किसानों की बात पर देश और प्रदेशों की सत्ता में काबिज सरकार की किसानों के प्रति इस भंयकर अनदेखी ने भी किसानों को आश्चर्य में डाल रखा है। मामले का संज्ञान लेकर कोई जनप्रतिनिधी या सरकारी नुमांइदा क्या इस मामले में रूचि लेता है या फिर किसानों को उनकी फुटी किस्मत पर छोड़ देता है, यह तो आने वाला ही समय बताएगा।
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